भूजल: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ बचाव का विश्व का उपेक्षित तरीका

अदृश्य, लेकिन अक्षय नहीं – भारत में भूजल दोहन के लिए आवश्यक है अविलंब शासन प्रणाली: वॉटरऐड इंडिया

• भारत दुनिया की कुल आबादी के 17.6 % लोगों का घर है लेकिन इसके पास दुनिया के ताज़े पानी के संसाधनों का मात्र 4% उपलब्ध है (स्त्रोत – कंपोज़िट वॉटर मैनेजमेंट इंडेक्स; स्वतंत्र मूल्यांकन समूह | वर्ल्ड बैंक)

• दशकों से भूजल का दोहन लगातार बढता रहा है; लगभग 17% भूजल खंडों में अत्यधिक दोहन किया गया है। (स्त्रोत – स्वतंत्र मूल्यांकन समूह | वर्ल्ड बैंक)

• कुछ क्षेत्रों में, जैसे कि दक्षिण एशिया के कुछ भागों में, भूजल संदूषित हो चुका है और इसमें अर्सेनिक और फ्लोराइड की चिंताजनक मात्रा पाई गई है। (स्त्रोत- ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे एंड वॉटरऐड)  

• 16वीं बिहार आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट 2021-22 में कहा गया है कि बिहार के 38 ज़िलों में से 31 ज़िलों के ग्रामीण इलाकों में भूजल उल्लेखनीय रुप से संदूषित हो गया है।

 


नई दिल्ली, मार्च 22, 2022: भूजल – जिसका अस्तित्व लगभग हर जगह भूमि के अंदर रहता है – में हज़ारों लाखों लोगों का जीवन बचाने और जलवायु परिवर्तन के खिलाफ दुनिया की बीमा पॉलिसी बनने की क्षमता होती है। विश्व जल दिवस 2022 के अवसर पर वॉटरऐड द्वारा “भूजल: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ बचाव का विश्व का उपेक्षित तरीका” नामक एक रिपोर्ट प्रकाशित की जा रही है जो दुनिया के विभिन्न हिस्सों में भूजल संसाधनों की स्थिति पर एक लक्षित रुप से ध्यान केंद्रित करती है। ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे (बीजीएस) एवं वॉटरऐड द्वारा किए गए नए विश्लेषण में खुलासा हुआ है कि अफ्रिका के कई देशों और एशिया के कुछ हिस्सों में पर्याप्त मात्रा में भूजल मौजूद है जिससे प्रत्येक व्यक्ति की रोजमर्रा की ज़रुरतें पूरी की जा सकती है और इसे लंबे समय के लिए संवहनीय बनाया जा सकता है। लेकिन, विशेष रुप से एशिया के कुछ भागों में खराब भूजल प्रबंधन और संदूषण के कारण एक कमी का निर्माण हो रहा है जिससे आने वाले कुछ वर्षों में लाखों लोग प्रभावित होंगे।  

उदाहरण के लिए उप-सहाराई अफ्रिका के कुछ हिस्सों में भूजल बड़े पैमाने पर अप्रयुक्त है जबकि दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में इसका अत्यधिक उपयोग होता है। यह, और इसके साथ अपर्याप्त विशेषज्ञता और निवेश के कारण खराब विनियम, कुप्रबंधन, संदूषण और प्रदूषण देखने मिलता है और आगे इसके संभाव्य रुप से विनाशकारी परिणाम सामने आते हैं।  

वॉटरऐड रिसर्च टीम के निष्कर्ष यह बताते हैं कि ज़्यादातर उत्तरी भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में भूजल का दोहन बारिश से होने वाले सालाना पुनर्भरण यानी रिचार्ज की तुलना में सामान्य तौर पर अधिक है। इसलिए सूखे के समय के दौरान, पानी की आपूर्ति करना असंवहनीय हो जाता है और ऐसे समय में यह खत्म हो जाता है जब लोगों को इसकी सबसे अधिक ज़रुरत होती है। कुछ दक्षिण एशियाई देशों में कृषि के लिए 90% तक के भूजल का दोहन किया जाता है।

इसके परिणाम स्वरुप, गांवों के कुएं सूख सकते हैं और समुदायों, स्वास्थ्य केंद्रों, और स्कूलों को उनकी रोज़ाना की आवश्यकताओं के लिए पर्याप्त पानी के बिना रहना पड़ सकता है। इसके अलावा दक्षिण एशिया और अफ्रिका दोनों जगहों में भूजल बहुत ही आसानी से प्रदूषित हो सकता है चाहे यह प्रदूषण गहन खेती के लिए इस्तेमाल होने वाले रासायनिक खाद और कीटनाशकों से हो या अनुचित तरीके से विनियमित उद्योग से निकलने वाले ज़हरीले रसायन या फिर स्वच्छता के अनुचित प्रबंधन से निकलने वाला मैला पानी हो।



टिम वैनराइट, यूके में वॉटरऐड के चीफ एक्ज़ीक्यूटिव ने कहा, “हमारे निष्कर्ष इस मिथक का पर्दाफाश करते हैं कि अफ्रिका में पानी खत्म होने के कगार पर है। लेकिन त्रासदी यह है कि महाद्वीप पर लाखों लोगों के लिए पीने के लिए शुद्ध पानी उपलब्ध नहीं है। लोगों के पैरों के नीचे ही पानी का विशाल भंडार मौजूद है, इनमें से कई में हर साल वर्षा और अन्य सतही जल के द्वारा पुन:पूर्ति हो जाती है, लेकिन वे यहाँ तक पहुँच प्राप्त नहीं कर पाते क्योंकि सेवाओं के लिए गंभीर रुप से धन का अभाव है। भूजल निकासी से लाखों लोगों के लिए सुरक्षित, शुद्ध पानी तक पहुँच को सुनिश्चित किया जा सकेगा चाहे जलवायु परिवर्तन उनके लिए किसी भी प्रकार का संकट क्यों न खड़ा करे।”  

इंडो गैंजेटिक बेसिन की सीमा पार से किया जाने वाला भूजल दोहन, सारे विश्व में किए जाने वाली भूजल निकासी का 25% है और इससे पाकिस्तान, भारत, नेपाल और बांग्लादेश में कृषि गतिविधियों को जारी रखा जाता है। नासा के ग्रैविटी रिकवरी और क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट सैटेलाइट्स से प्राप्त किए गए आंकड़ें दर्शाते हैं कि राजस्थान, पंजाब और हरियाणा (दिल्ली सहित) जैसे भारतीय राज्यों में भूजल स्तर [4.0 ± 1.0 सेमी वर्ष-1 पानी की समकक्ष ऊंचाई (17.7 ± 4.5 किमी3 वर्ष-1) की दर से] कम हो रहा है। इसके साथ ही इन आंकड़ों के अनुमान के मुताबिक 200 मीटर तक गहराई के भूजल का वॉल्यूम सिंधु, ब्रम्हपुत्र और गंगा के मिश्रित प्रवाह से भी 20 गुना अधिक है। यह दर्शाता है कि साल 2000 से 2012  के बीच वाटर टेबल यानी भूमि के अंदर पानी का स्तर स्थिर रहा है या संपूर्ण 70% जलभृतों (aquifer) में इसमें बढ़ोतरी होती रही है।  

दुनिया के ताजे पानी के संसाधनों का केवल 4% ही भारत के पास है। पिछले कई दशकों से भूजल के दोहन में लगातार बढ़ोतरी होती रही है। पिछले 50 वर्षों में, बोरवेल की संख्या 10 लाख से कई गुना बढ़कर 2 करोड़ हो गई है, जो भारत को दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता बनाते हैं। भारत के केन्द्रीय भूजल बोर्ड के अनुमान के मुताबिक भूजल के 17% खंड ऐसे हैं जहाँ अत्यधिक पानी का दोहन किया गया है (इसका मतलब जिस दर से जलभृत रिचार्ज यानी पुनर्भरण कर पाता है उसकी तुलना में भूजल निकाले जाने का दर कहीं अधिक है) जबकि 5% और 14% खंड क्रमश: गंभीर और अर्ध-गंभीर चरणों में आते हैं। तीन क्षेत्रों में – उत्तर पश्चिमी, पश्चिमी और दक्षिण प्रायद्वीपीय भारत में स्थिति विशिष्ट रुप से गंभीर है।

भारत में भूजल स्थिति पर अपने विचार साझा करते हुए वी के माधवन, चीफ एक्ज़ीक्यूटिव, वॉटरऐड इंडिया ने कहा, “हमें यह पहचानने की ज़रुरत है कि भले ही भूजल अदृश्य है लेकिन यह अक्षय नहीं है। भूजल के दोहन को शासन प्रणाली तय करने और इसकी मांग को कम करने की अत्यधिक आवश्यकता है। इसके साथ ही हमें हमारे जलभृतों (aquifer) को एक प्रणालीगत तरीके से रिचार्ज करने, विशेष रुप से सतही जल स्त्रोतों का इस्तेमाल कर और रिचार्ज़ ज़ोन में रिसाव को बढ़ाकर हमारे संवर्धन के प्रयासों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करने की ज़रुरत है। भूजल के संदूषण के बढ़ते हुए साक्ष्य एक ऐसी समस्या की ओर इशारा करते हैं जिस पर जितना ध्यान देना आवश्यक हैं उससे कहीं कम ध्यान दिया गया है। अब ज़रुरत हैं कि हम कृति करें। ”

“निवास-स्थान के करीब संवहनीय जल संसाधनों तक पहुँच सुनिश्चित करने के लिए समुदाय आधारित जल गुणवत्ता जांच और निगरानी का निर्माण करने और जल संवर्धन के लिए वॉटरऐड इंडिया संपूर्ण भारत में कई ज़िलों में कार्य कर रही है।”

 

कुछ क्षेत्रों में, जैसे कि दक्षिण एशिया के कुछ भागों में, भूजल अर्सेनिक और फ्लोराइड के साथ प्राकृतिक रुप से संदूषित हो चुका है। यदि इसका उपचार नहीं किया गया तो इससे बीमारी फैल सकती हैं या मौत भी हो सकती है। उदाहरण के लिए, भारत में अर्सेनिक के संदूषण से भारत के उत्तरी राज्य उत्तर प्रदेश, बिहार और पूर्व में पश्चिम बंगाल जैसे राज्य प्रभावित हुए हैं। ओडिशा के कई ज़िले फ्लोराइड, लोह और खारेपन की उच्च मात्रा से प्रभावित हैं। मध्य और दक्षिण पूर्व भारत के कुछ हिस्सों में भी नाइट्रेट और लोह के संदूषण की उच्च मात्रा पाई गई है।

हाल ही में प्रकाशित किए गए 16 वें बिहार आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा गया है कि बिहार के 38 ज़िलों में से 31 ज़िलों के ग्रामीण इलाकों में भूजल भारी मात्रा में संदूषित हो गया है; अर्सेनिक, फ्लोराइड और इसके साथ ही लोह के संदूषण से पानी प्रभावित हुआ है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 38 ज़िलों में से 31 ज़िलों के ग्रामीण इलाकों के भूजल में अर्सेनिक, फ्लोराइड और लोह की उच्च सान्द्रता है और इससे स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। 30,272 ग्रामीण वार्डों में रासायनिक संदूषण पाया गया है। गंगा नदीं के आसपास 14 ज़िलों के कुल 4,742 वार्ड़ अर्सेनिक संदूषण से प्रभावित हैं।  

इस रिपोर्ट में आगे वार्षिक सरकारी बजट और बढ़े हुए अंतर्राष्ट्रीय दाता और निजी क्षेत्र के निवेश के एक तय प्रतिशत के माध्यम से उपेक्षित समुदायों के लिए जल और स्वच्छता वित्तपोषण में बढ़ोतरी की जरुरत पर विशेष ज़ोर दिया गया है।

इसके साथ ही यह सीओपी 27 के साथ सहमति के महत्व पर भी ज़ोर देती है कि इसके लिए ज़िम्मेदार भूजल विकास और ज्ञान, विशेषज्ञता, आर्थिक और संस्थागत सहायता में निवेश आवश्यक है, और यह जलवायु परिवर्तन संकट के अग्रिम मोर्चे पर रहने वाले समुदायों के लिए जीवन-रक्षा करने वाले, संवहनीय और सुरक्षित पानी और स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए सबसे प्रमुख है।    

वॉटरऐड और बीजीएस का कहना है कि इसे हासिल करने के अनेक तरीकों में से एक है पृथ्वी की उपसतह का बेहतर मानचित्रण और निगरानी के लिए निवेश करना ताकि यह पता लगाया जा सके कि अच्छी गुणवत्ता वाला भूजल न सिर्फ कहाँ मौजूद है लेकिन इसके साथ ही कहाँ इसे संवहनीय और किफायती तौर पर निकाला जा सकता है ताकि इसकी पूर्ण क्षमता का लाभ प्राप्त हो सके।

 

वॉटरऐड इंडिया के बारे में

वॉटरऐड एक ग़ैर-लाभकारी संगठन है जो प्रत्येक व्यक्ति के लिए और सभी जगह शुद्ध पानी, स्वच्छ शौचालय और अच्छी स्वच्छता को सामान्य बनाने के लिए संकल्पित है। वर्ष 1986 से वॉटरऐड इंडिया ने गरीबों और सर्वाधिक रुप से उपेक्षित लोगों के जीवन में परिवर्तन लाने के लिए पानी, सफाई व्यवस्था और स्वच्छता से जुड़ी परियोजनाओं को सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया है। भारत में वॉटरऐड 12 राज्यों में मौजूद है। साल 2020-21 में वॉटरऐड इंडिया ने 3,59,751 लोगों को स्वच्छ पानी, 17,970 लोगों को उपयुक्त एवं स्वच्छ शौचालय तक पहुँच उपलब्ध कराई है और 98,217 से अधिक लोगों को स्वच्छता के बारे में जानकारी प्रदान की है।

ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे के बारे में

द ब्रिटिश जियोलॉजिकल सर्वे विश्व की एक अग्रणी भूवैज्ञानिक और वैश्विक भूविज्ञान संस्था है जो सरकार और अनुसंधान के लिए लोक कल्याणकारी विज्ञान पर केंद्रित है ताकि पृथ्वी और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं को समझा जा सके। एक सुरक्षित, अधिक संवहनीय और संपन्न ग्रह और सशक्त भूवैज्ञानिकी समाधानों पर आधारित भविष्य के लिए हमारा विज़न है। 

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