लोकतंत्र के उत्सव में भाग लेने वाले समस्त मतदाताओं को बधाई।

  अरविंद त्रिवेदी


मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव खासी गहमागहमी के बीच संपन्न हुए। हर प्रत्याशी ने अपनी ताकत पुरजोर तरीके से झोंकी। चुनाव के पहले की तस्वीर तमाम अटकल बाजियों को जन्म दे रही थी। चौराहो-चौराहो पर तथाकथित चुनाव विश्लेषक उभर कर आये। सभी इस उत्सव का अपने अपने तरीके से आनंद ले रहे थे। मजेदार बात यह रही कि जिन्होंने कभी किसी विधानसभा क्षेत्र की गलियां भी नही देखी थी, वो वहां की हार जीत का दिलचस्प नजारा अपने तर्कों के आधार पर या यह कहें कि यहां वहां से सूचना बटोरकर कयासों की थाली में पेश कर रहे थे। कई तरह की जोड़ तोड़ का आविष्कार चौपालों और चौपाटी पर होता हुआ देखना भी कार्यकर्ताओं के चेहरे पर चिंता की लकीरें खींच रहा था। चुनाव जीतने की जितनी जुगाड़ प्रत्याशियों के दिमाग में आ रही होगी उससे ज्यादा अफवाहें बनकर चुनावी रणभूमि में छा रही थी। अलग-अलग दलों के प्रशंसकों की आपसी बहस में मीडिया की भूमिका उत्प्रेरक का कार्य कर रही थी। जीत-हार के दावों का बाजार गर्म था, लेकिन मतदाताओं का ठंडा रुख परेशान कर रहा था। मतदाताओं का मौन ठीक वही असंमजस पैदा करता रहा जैसा असमंजस जीतने के बाद अधिकतर नेता अपनी जनता के लिए पैदा करते रहते हैं। मतदाताओं का मौन किस कदर जागरुकता में बदल जाता है, इसका उदाहरण भी इन्ही चुनावों में देखने को मिला । जब प्रदेश में पहली बार रिकॉर्ड मतदान ने विभिन्न दलों में खलबली मचा दी। चुनाव के पहले ऐसा लग रहा था कि भारत की एकता, सर्वधर्म, सद्भाव, उंच नीच, जाति प्रथा विरोध के आदर्शों पर चलने का दावा करने वाली पार्टियां, इन आदर्शों को पीछे रखकर किस समाज की कहां कितनी ताकत है? योग्य प्रत्याशी के स्थान पर जीतने योग्य प्रत्याशी की तलाश जैसे मामलों को केंन्द्र में रखते हुए नजर आई। जातिगत समीकरणों का जाल बिछाया जाने लगा और आम बहस में भी लोग जातिगत समीकरणों के जाल में फंसते नजर आ रहे थे। यह विडंबना है कि विकास की बातें बाद में और जाति विशेष के नेता और बातें, प्रभाव क्षेत्र की बातें ज्यादा होती रही। ऐसा लग रहा था कि परा समाज अपने- अपने जाति के ठेकेदारों में बंट गया है। ऐसा पहली बार नही हुआहर चुनाव में यह जिन्न बोतल से बाहर आ जाता है। लेकिन पिछले चुनाव परिणाम यह बताते हैं, चाहे वह लोकसभा के हों अथवा विधानसभा के। परिणामों के बाद यह जिन्न हवा हो जाता है और अप्रत्याशित नतीजें सामने आते हैं। जिस तबके से कोई उम्मीद नहीं करने की समझाईश दी जाती रही उसी तबके के वोट उस प्रत्याशी को चुनाव जिताकर ले गए। उत्तरप्रदेश के चुनाव इसका एक बड़ा उदाहरण बना। रिकॉर्डतोड़ मतदान ने जातिगत समीकरणों को और ज्यादा रहस्यमयी बना दिया हैमतदाताओं की यह जागरुकता तथा वोट देने की ललक ने प्रत्याशियों की धड़कने बढ़ा दी है। किसी को समझ नही आ रहा कि बढ़ा हुआ प्रतिशत किस दिशा में संकेत कर रहा है। हर कोई अंधेरे में तीर चला रहा है। यहां तक कि चुनावी चिंतक तमाम राजनितिक विश्लेषक की कलम भी अलग-अलग भविष्यवाणी कर रही है। अलग-अलग चश्मे से नतीजों को देखा जा रहा है। पहला तर्क, सत्ताविरोधियों का जो कहतें हैं बढ़ा हुआ प्रतिशत सत्ता विरोध की लहर पर सवार है। 2003 के चुनाव में बंपर वोटिंग कांग्रेस के विरुध्द हुई थी, 2018 उसी की पुनरावृत्ति है। पर इन परंपरागत विचारवानों को बताया जाता है कि 2008 और 2013 के चुनावों का प्रतिशत भी बढ़ा हुआ था। जिसमें जीत सता के साथ गई थी। इस तरह सत्ता समर्थक लोगों का यह तर्क भी काम का दिखाई देता है। दूसरा तर्क उभरकर आया कि 15 साल की एंटी इन्कमबेंसी और भ्रष्टतम सरकार ने आम आदमी को गुस्से में डाल दिया जिसमें व्यापम जैसे घोटाले, बेरोजगारी के मुद्दे हावी रहे। इसी नाराजगी के चलते लोग शिवराज को कमजोर मुख्यमंत्री मानने लगे । यह तर्क अपने आप में वजनदार माना गया, तो इसकी काट भी कोई कमजोर नही थी। जब कहा गया कि व्यापम तो पिछले चुनाव में भी मुद्दा था पर काम नही आया। वो यह भी कहते नहीं चूके कि स्वयं राजीव गांधी कहा करते थे कि एक रुपये में से 10 पैसे ही सही जगह पंहुच पाते हैं। यह बात जनता को अभी तक याद है। इस तरह तर्कों की तलवार टकराती रही। इसी बीच एक अन्य विचारक विचार प्रकट करते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में बंपर मतदान किसानों की भयंकर नाराजगी प्रदर्शित करती है। वो किसान जो युरिया की लाईन में लगे रहे जिन्हे फसलों का सही दाम नही मिला। साथ ही भावातर योजना किसी घोटाले से कम साबित नहीं हुई। लगे हाथ यह भी जोड़ दिया कि नोटबंदी और राफेल तो इस करेले पर चढ़े नीम के समान हैं। उपर से किसानों को सरेआम मार देना, बर्बाद फसल का मुआवजा न मिलना, इन सभी बातों ने मिलकर किसानों में विद्रोह पैदा कर दिया है जिसके चलते बदलाव तय है। जैसे ही यह तर्क सामने आता, कुछ देर के लिए सन्नाटा छा गया। फिर एक व्यक्ति यूट्यूब पर एक वीडिया दिखाता है जिसमें एक अंग्रेजी चैनल के पत्रकार द्वारा मृतक के पिता से मुआवजा संबंधी सवाल पूछने पर जैसे ही उसने कहा कि मुझे कुछ नहीं दिया। वहां मौजूद भीड़ चिल्लाकर बता रही है कि मारे गए किसान के पिता को एक करोड़ रुपया दिया गया। सत्ता समर्थक को जैसे संजीवनी मिल गई, वह तुरंत जोश से कहता है कि यह भी तो हो सकता है कि सरकार की जिन योजनाओं ने अंत्यंत गरीबों के दुःख दूर किये जैसे आवास योजना में मिला घर, शौचालयों के लिए मिला पैसा, मजदूर कार्ड, संबल योजना, जनधन बीमा योजना के लाभ, बेटी के पैदा होने से शादी तक की व्यवस्था ( लाड़ली लक्ष्मी योजना), बिजली बिल माफ कर 200 रु प्रतिमाह में 24 घंटे बिजली, सस्ता अनाज आदि ने उन गरीब मतदाताओं को भी मतदान करने पर विवश कर दिया हो जो जिन्होंने निराशा के चलते आज तक मतदान ही ना किया हो। बढ़ा हुआ मत प्रतिशत इस बात का परिणाम भी हो सकता है। फिर एक बार सन्नाटा छाता है और एक घोषणा और याद दिलाई जाती है कि 10 दिन में 2 लाख रुपये तक की कर्जमाफी भी तो किसानों को कांग्रेस का साथी बना सकती है। वार-पलटवार का दौर चलता रहेगा पर संतोष की बात यह है कि 75 प्रतिशत मतदान ने जातपात वाले दावों पर ग्रहण लगा दिया। कई स्थानों पर 80 प्रतिशत तक हुए मतदान ने यही साबित किया है कि कोई भी समाज किसी एक के कहने पर नहीं चलता। मतदाता अभी भी मौन खड़ा मुस्कुरा रहा है मानो लोकतंत्र मुस्कुरा रहा हो और कह रहा हो कि क्या कहता है वोटर, पता चलेगा 11 दिसंबर को। भाजपा की या कांग्रेस की कौन सी बातें वोटर को पसंद या नापसंद आई। यह तो तभी पता चलेगा जब वो अपना मौन परिणामों के बाद तोड़ेगा। यकीन मानिए वो तोड़ेगा अवश्य । विशेषण उसके बाद भी होंगे। देखा मैंने सही कहा था के दावे 11 दिसम्बर के बाद भी होंगे। सफाईयों का दौर भी चलेगा। और उसके बाद जैसा होता आया है कि सभी अपने कामों में लग जाएंगे। पाठक अपने आपको किस तर्क के करीब पाते हैं वो भी स्वीकार है आखिर आप मतदाता हैं और फैसला आपका मानना लोकतंत्र के प्रहरियों की जिम्मेदारी है।


हर कोई अंधेरे में तीर चला रहा है। यहां तक कि चुनावी चिंतक तमाम राजनितिक विश्लेषक की कलम भी अलग-अलग भविष्यवाणी कर रही है। अलग अलग चश्मे से नतीजों को देखा जा रहा है। पहला तर्क, सत्ताविरोधियों का जो कहतें हैं बढ़ हआ प्रतिशत सत्ता विरोध की लहर पर सवार है। 2003 के चुनाव में बंपर वोटिंग कांग्रेस के विरुध्द हुई थी, 2018 उसी की पुनरावृत्ति है। पर इन परंपरागत विचारवानों को बताया जाता है कि 2008 और 2013 के चुनावों का प्रतिशत भी बढ़ा हुआ था।



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