ध्यान व उपासना के माध्यम से ही आत्मानंद को प्राप्त किया जा सकता है - संत रेणुका जी
- (ग्राम रातातलाई में आयोजित सत्संग समारोह में सतपाल महाराज की शिष्या ने दिया आध्यात्मिक संदेश)
भारत सागर न्यूज/देवास। हमारे ऋषियों ने ध्यान को ईश्वर से जुड़ने का परम साधन माना है। एकाग्रचित ध्यान के माध्यम से की गई ईश्वर की उपासना से आत्मा को अलौकिक एवं आनंद रूपी भोजन की प्राप्ति होती है। मनुष्य संसार में आकर इस भौतिक शरीर को प्राप्त करके केवल इसी की सजावट एवं संवर्धन में लगा रहता है और नाना प्रकार के व्यंजनों से शरीर को तप्त करने में लगा रहता है, परंतु शरीर के भीतर विद्यमान आत्म तत्व के भोजन से वह सदैव ही अनभिज्ञ ही रहता है।
उक्त आत्म कल्याणकारी सत्संग विचार ग्राम रातातलाई में मानव उत्थान सेवा समिति के सक्रिय कार्यकर्ता ज्ञान सिंह चौहान के नव गृह प्रवेश के अवसर पर आयोजित सत्संग समारोह में श्री सतपाल महाराज की शिष्या रेणुका बाई जी ने व्यक्त करते हुए कहा उपासना रूपी आध्यात्मिक संपत्ति से ही आत्मा के भोजन का प्रबंध होता है। तीनों लोकों की संपत्ति में भी आत्मा के भोजन का प्रबंध करने की क्षमता नहीं है। वैदिक ग्रंथों का स्वाध्याय करके, ध्यान एवं उपासना के पथ पर अग्रसर होकर ही हम इस आत्मा को आनंद से परिपूर्ण तृप्ति प्रदान कर सकते हैं।
बड़ी संख्या में उपस्थित अध्यात्म प्रेमियों को संबोधित करते हुए संत श्री ने आगे कहा ज्ञान के माध्यम से ईश्वर के आनंद की अनुभूति ही जीवात्मा का वास्तविक भोजन है। इसी दिव्य भोजन से आत्मा के अंदर आध्यात्मिक एवं साधना के पथ पर ले जाने वाली विभूतियों का उदय होता है। शरीर के भोजन के प्रबंध के साथ-साथ हमें आत्मा के भोजन का भी प्रबंध करना चाहिए। बिना इस दिव्य भोजन के आत्मा निर्बल,असक्त, ज्ञानहीन होकर ईश्वर के सानिध्य से सदैव वंचित रहता है।
इस मौके पर उपस्थित महात्मा प्रभावती जी ने भजन -- मुसाफिर यों क्यों भटके रे, तू ले ले हरि का नाम काम तेरो कभी न अटके रहे... की सुंदर प्रस्तुति देते हुए कहा महाज्ञानी बनने से भगवान नहीं मिलते, बल्कि सच्ची भक्ति से ही उन्हें पाया जा सकता है। हर कर्म के लिए दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है, चाहे वह अच्छा हो या बुरा। बुरे काम के लिए जिद करने वाले खतरा बन जाते हैं, वहीं अच्छे काम के लिए जिद करने वाले महान बन जाते हैं। उनकी प्रगति कोई नहीं रोक सकता। परमार्थ की प्राप्ति के लिए भी इसी प्रकार की जिद आवश्यक है, मैं अवश्य पाऊंगा, पाकर रहूंगा। यह जिद एक प्रकार का आध्यात्मिक उन्माद है, जहां आदर्श के लिए सब कुछ न्यौछावर करने की तत्परता होती है। जीवन में किसी भी क्षेत्र में दुविधा नहीं होनी चाहिए। जहां दो चीजों हो, वहां एक को चुनना और दूसरे का त्याग करना ही समझदारी है। मनुष्य के जीवन का एकमात्र व्रत है परम पुरुष को प्राप्त करना, इसके अलावा कोई दूसरा व्रत नहीं हो सकता। हमें ईश्वर के स्वरूप को लेकर किसी दुविधा में नहीं फंसना चाहिए, बल्कि एक ही लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना चाहिए। इससे हमारी एकाग्रता भी बनेगी और आस्था के प्रति कोई प्रश्न नहीं उठेगा। जब मन में प्रश्न उठना रहेगा, तो वह साधना का सही मार्ग नहीं होगा। हमें ऐसे विचारों को अपनाना चाहिए, जो धर्म पर आधारित, व्यवहारिक और तर्कसंगत हो। तभी व्यक्तिगत आध्यात्मिक प्रगति और समाज का कल्याण संभव है। इस मौके पर उपस्थित संत नमिता बाई जी ने भी ज्ञान-भक्ति, वैराग्य से ओतप्रोत मधुर भजनों के माध्यम आत्म कल्याणिकारी सत्संग विचार रखें।
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