अवंतिका की रक्षा के लिए सड़कों पर बही मदिरा की धार, अखाड़ा परिषद की अगुवाई में संपन्न हुई भव्य 'नगर पूजा




भारत सागर न्यूज/उज्जैन/संजय शर्मा । बाबा महाकाल की नगरी की सुख-समृद्धि और प्राचीन परंपरा का निर्वहन करने के लिए आज चैत्र नवरात्रि की महाअष्टमी पर भव्य 'नगर पूजा' का अनुष्ठान संपन्न हुआ। अवंतिका की खुशहाली के लिए आयोजित इस विशेष पूजन के दौरान शहर की सड़कों पर 28 किलोमीटर लंबी मदिरा की धार प्रवाहित की गई।




सुबह 8 बजे चौबीस खंबा माता मंदिर से इस ऐतिहासिक यात्रा का श्रीगणेश हुआ, जहाँ अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी महाराज की मौजूदगी में मां महामाया और महालाया को मदिरा का नैवेद्य अर्पित किया गया। ढोल-धमाकों और माता के जयकारों के साथ निकली इस भक्तिमयी यात्रा में देश के प्रतिष्ठित संत, महंत और महामंडलेश्वर विशेष रूप से सम्मिलित हुए, जिन्हें देखने के लिए मार्ग भर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।




​नगर पूजा के महत्व पर प्रकाश डालते हुए अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी महाराज ने बताया कि यह अनुष्ठान केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि नगर की रक्षा का एक प्राचीन आध्यात्मिक कवच है। उन्होंने कहा कि संतों के नेतृत्व में निकाली गई इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य पूरे शहर के कल्याण की कामना करना और आने वाली बाधाओं को दूर करना है। 




पूरी यात्रा के दौरान एक पात्र में मदिरा लेकर कोटवार सबसे आगे चले और भूमि पर इसकी अखंड धार अर्पित की गई। यह यात्रा शहर के चारों कोनों को छूते हुए 28 किलोमीटर का लंबा सफर तय कर अंकपात मार्ग स्थित हांडी फोड़ भैरव मंदिर पहुँची, जहाँ इसका विधि-विधान से समापन हुआ।
​चौबीस खंबा माता मंदिर के पुजारी रवि पुजारी ने बताया कि यह अनूठी परंपरा राजा विक्रमादित्य के शासनकाल से चली आ रही है। उन्होंने जानकारी दी कि नगर की सुख-समृद्धि के लिए साल में दो बार यह नगर पूजा की जाती है। शारदीय नवरात्रि में शासन द्वारा यह पूजन किया जाता है जिसकी कमान कलेक्टर संभालते हैं, जबकि चैत्र नवरात्रि की यह दूसरी नगर पूजा अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद द्वारा संपन्न की जाती है। मंदिर में महामाया और महालाया के मदिरा पूजन के बाद शुरू हुई इस यात्रा के दौरान मार्ग में आने वाले सभी देवी और भैरव मंदिरों में नए ध्वज फहराए गए और प्रतिमाओं को सुंदर चोला चढ़ाया गया।
​करीब 12 घंटे तक चले इस महाअनुष्ठान के दौरान अवंतिका का कोना-कोना भक्ति के रंग में डूबा नजर आया। प्रशासन ने भी सुरक्षा और यातायात व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए व्यापक प्रबंध किए थे, जिससे संतों के जत्थे और श्रद्धालुओं को सुगमता रही। मान्यता है कि इस प्राचीन विधान से नगर पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं और माता रानी की कृपा पूरे साल शहरवासियों पर बनी रहती है। मदिरा की धार और आस्था के इस संगम ने एक बार फिर उज्जैन की गौरवशाली परंपराओं की जीवंतता को सिद्ध कर दिया है।

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