स्वतंत्र भारत में किसानों,मजदूरों का शासन होगा, व्यक्तिगत पूंजी नहीं होगी एवं यदि लोकतंत्र आया तो यह कुछ पढ़े लिखे लोगों का मजदूरो व किसानों पर शासन होगा- मुंशी प्रेमचंद
भारत सागर न्यूज/देवास। प्रगतिशील लेखक संघ, इकाई, देवास के तत्वावधान में मुंशी प्रेमचंद जी की 144वीं जयंती स्कॉलर अकैडमी, जयश्री नगर,देवास मे दो सत्रों में मनाई गई। कार्यक्रम के प्रथम सत्र में स्कॉलर अकैडमी के छात्रों ने प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी दो बैलों की कहानी का प्रभावी नाट्य मंचन किया। उपस्थित छात्र-छात्रओं, साहित्यकारों ने करतल ध्वनि से उनका उत्साह वर्धन किया । प्रतिभागियों को श्रीमती रेखा उपाध्याय के द्वारा पेन व कापी देकर पुरस्कृत किया।
कार्यक्रम के दुसरे सत्र में प्रेमचंद होने का अर्थ विषय पर उपस्थित साहित्यकारों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त किया। प्रसिद्ध कवि शशि भूषण द्वारा प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानी परीक्षा का भावपूर्ण रिकॉर्डिंग जिसको की उनके द्वारा व्हाट्सएप पर प्रसारित किया गया था को उपस्थित जनों को सुनवाया गया ।उनके कथानुसार यह कहानी शिक्षा, प्रतिभा, पद, प्रदर्शन, तैयारी, चैन, सफलता और सार्वजनिक जीवन मे सार्थकता पर बड़ी मानीखेज कहानी है।
कार्यक्रम का सफल संचालन प्रलेस, देवास अध्यक्ष श्रीमति कुसुम वागड़े ने किया। उन्होंने प्रेमचंद के साहित्य के कई प्रेरक प्रसंगों का जिक्र किया। जैसे कि, जो शिक्षा हमें निर्बलों को सताने के लिए तैयार करे, जो हमें भोग विलास में डूबाए,जो हमें धरती पर धन का गुलाम बनाए, जो हमें दूसरों का खून पीकर मोटा होने का इच्छुक बनाए, वह शिक्षा नहीं भ्रष्टता है।
प्रसिद्ध चिंतक व साहित्यकार डॉक्टर प्रकाश कान्त ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रेमचंद के सम्पूर्ण साहित्य पर सविस्तार रोशनी डालते हुए कहाकि प्रेमचंद के पूर्व कई समाज सुधारकों ने भारत में कई सामाजिक सुधार किये। राजाराम मोहन राय ने सती प्रथा का अंत किया। ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने विधवा विवाह प्रारंभ करवाये। सावित्री बाई फूले ने स्त्री शिक्षा प्रारंभ करवाई। प्रेमचंद ने अपने उपन्यास निर्मला में बेमेल विवाह पर खुलकर लिखा। तात्कालिक बंगाल में 8-10 वर्ष की कन्या का विवाह 70-75 वर्ष के वृद्ध व्यक्ति से करने के कारण से विधवाओं की फौज तैयार हो गई थी।
डॉक्टर प्रकाश कान्त ने कहाकि कुल 56 वर्ष की उम्र में से 30 वर्ष लिखने को मिले जिसमे उन्होंने 08- 10 उपन्यास, सेवासदन, प्रेमाश्रम, गबन, गोदान, रंगभूमी, करबला व 275 से लेकर 300 के लगभग कहानियाँ लिखी। हंस, सरस्वती ,अनेक अखबारों में लिखते थे। उनका हिन्दी,ऊर्दू, अंग्रेजी व फारसी पर समान अधिकार था। प्रारंभिक लेखन ऊर्दू में धनपत राय व नवाबराय नाम से किया। प्रेमचंद एक अच्छे अनुवादक भी थे। उन्होंने टॉलस्टॉय की रचनाओं सहित कई बड़े विदेशी साहित्यकारों के ग्रन्थों का अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद भी किया था। प्रेमचंद ने तीन स्थापनाऐं दी थी। पहली कि स्वतंत्र भारत में मजदूरों व किसानों का शासन होगा। दूसरी कि व्यक्तिगत पूंजी नहीं होनी चाहिए। तीसरी कि यदि भारत में लोकतंत्र आता है तो यह कुछ पढ़े लिखे लोगों का मजदूरों व किसानों पर शासन होगा।
श्रीमति प्रतिभा चंद्र कुमार कवियत्री ने समसामयिक परिवेश मे प्रेमचंद की रचनाओं के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक महत्वों का वर्णन करते हुए कहा कि जिस प्रकार अंग्रेजों के शासन काल मे प्रेमचंद ने अपनी कहानियों, उपन्यासों आदि के पात्रों का वर्णन तात्कालिक समय की परिस्थितयों जातिवाद, ऊँच-नीच, छुत अछुत होने के प्रमाण का निडरता से वर्णन किया है। वे कालजयी पात्र आज भी देश में आजादी के अमृत महोत्सव काल तक में उसी प्रकार से उपस्थित हैं ।अच्छाईयों का संविधान के तहत प्रादुर्भाव हुआ था का इन दस वर्षों के शासन काल में उन्ही पात्रों की समस्यों को दोहराए जा रहा है और उसी काल की और ले जाने की कोशिश की जा रही है ।
आज के काले अंग्रेज काले कानून ला रहे हैं । लेखकों,पत्रकारों की हत्या की जा रही है। यूएपीए लगाकर जैलों में ठुंसा जा रहा है। प्राचार्य जयोति देशमुख ने कहा की दो बैलों की कथा में मनुष्य एवं जानवर के व्यवहार की समझ और समानता का वर्णन हुआ है। कहा कि उनमें भी प्रेमपूर्वक संवेदनात्मक व्यवहार की आवश्यकता होती है। प्रसिद्ध कवि बहादुर पटेल द्वारा प्रेमचंद की किताबों का उनके सुपुत्र अमृतराय के तीन संकलनों का वर्णन किया गया। प्रेरक उद्धरणों का पाठ किया गया। प्रसिद्ध कहानियों पर प्रकाश डाला गया। वरिष्ठ कवि औंकारेशवर गेहलोद ने अपनी रचना के माध्यम से प्रेमचंद के व्यक्तित्व का वर्णन किया। श्रीमति साधना गुप्ता ने भी सविस्तार अपनी बात रखी । कई प्रेरक प्रसंगों का जिक्र किया।
के.एस. राजपूत ने कहा कि जिस प्रकार प्रेमचंद की कहानी, ठाकुर का कुआ में अछुत को स्वच्छ जल नहीं पीने दिया जाता है फलस्वरूप उसकी मौत हो जाती है। इसी प्रकार से 2023 के राजस्थान में सवर्ण शिक्षक के मटके से अछुत छात्र के पानी पीने पर उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी जाती है। वर्तमान में हालत बद से बदतर हो रही है। अंधविश्वास, पाखंड, हिंसा को बढ़ावा दिया जा रहा है। फासिस्ट ताकतों का खतरा बढ़ रहा है । ऐसी हालत में प्रेमचंद अधिक प्रासंगिक हो गए है।उनको पढऩा पढ़ाना और भी जरूरी हो गया है। वे मनुवाद के सख्त खिलाफ थे। वे वैज्ञानिक सोच के लेखक थे। सभी धर्मों के भाई चारे के कट्टर समर्थक थे ।प्रगतिशील लेखक संघ के1936 मे प्रथम अध्यक्ष चुने जाने पर प्रेमचंद अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा था कि, साहित्य का काम राजनीति के आगे मशाल लेकर चलने का होता है । सत्ता के तलवे चाटने का नहीं। श्री ध्रुव जोशी ने भी विस्तारपूर्वक अपनी बात रखी। कार्यक्रम के अंत मे प्रलेस सचिव राजेन्द्र राठौर ने सभी वक्तओं के वक्तव्यों पर सार गर्भित टिप्पणी की व स्कॉलर अकैडेमी प्राचार्य सहित सभी का आभार प्रदर्शन किया गया। इस कार्यक्रम में ओमप्रकाश वागड़े, शायर अजीज रोशन, अजीजुर रहमान शेख, सुरेश जैठवा, राजुल श्रीवास्तव, अमेय व श्रीमती संजीवनी कान्त, श्रीमती उपाध्याय व उनकी सुपुत्री एवं अन्य वरिष्ठ नागरिक गण उपस्थित हुए।
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