"द्वितीय देवी माँ ब्रह्मचारिणी की वंदना"


कठिन किया था तप शिव जी को पाने हेतु इसी तप के प्रभाव का नाम तपश्चारिणी ,
दाहिनी भुजा में थामे माला तप की सौम्य स्वरूपी माँ वामहस्त कमण्डल धारिणी ,
लक्ष्य से कभी न तुम विचलित होना यही ज्ञान देती माँ जगदम्बा गौरी जगतारिणी ,
नवदुर्गा में होता दूसरा स्वरूप इनका श्वेतवसन
धारिणी माता ब्रह्मचारिणी ।।


कवयित्री आरती अक्षय गोस्वामी
देवास मध्यप्रदेश


 


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