अतिक्रमण हटाओ अभियान या अन्याय....?





भारत सागर न्यूज/देवास। देवास जिले के खातेगांव विकासखंड के अंतर्गत आने वाले वन ग्राम खिवनी में हाल ही में वन विभाग द्वारा की गई कार्रवाई ने स्थानीय आदिवासी समुदाय को गहरे संकट में डाल दिया है। विभाग ने बारिश के मौसम में दर्जनों आदिवासी परिवारों के आशियाने तोड़ दिए, जिससे ये लोग अब खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए हैं।




प्राप्त जानकारी के अनुसार, वन विभाग की यह कार्रवाई उस समय की गई जब क्षेत्र में मूसलधार बारिश हो रही थी। प्रभावित परिवारों का कहना है कि ये मकान कोई नया निर्माण नहीं थे, बल्कि वर्षों की मेहनत और पीढ़ियों से चली आ रही बसाहट का परिणाम थे।




स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों ने आरोप लगाया है कि यह कार्यवाही हाल ही में हुई कुछ घटनाओं के प्रतिशोधस्वरूप की गई प्रतीत होती है। ग्रामीणों ने सवाल उठाया है कि जब मुख्यमंत्री स्वयं यह कहते हैं कि वन अधिकार कानून के तहत पात्र लोगों को पट्टे दिए जाएंगे, तो फिर ऐसे संवेदनशील समय में आदिवासी परिवारों को उनके बसे-बसाए घरों से बेदखल करना किस नीति के तहत किया गया?





मान लिया जाए कि यह भूमि वन भूमि थी और वहां अतिक्रमण किया गया था, तब भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या वर्षा ऋतु जैसे कठिन समय में इस प्रकार की कार्रवाई मानवीय और संवैधानिक दृष्टिकोण से उचित है? वर्षा के इस कठिन समय में बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को खुले में रहने पर मजबूर करना न केवल अमानवीय है, 


बल्कि यह मानवाधिकारों का भी उल्लंघन माना जा सकता है। कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों ने इस कार्रवाई की निंदा की है और राज्य सरकार से तत्काल हस्तक्षेप कर पुनर्वास की मांग की है।इस मामले में वन विभाग का आधिकारिक पक्ष अभी तक सामने नहीं आया है, 




जबकि ग्रामीणों की मांग है कि इस घटना की उच्चस्तरीय जांच की जाए, दोषियों पर कार्रवाई हो और प्रभावित परिवारों को तत्काल राहत दी जाए। जब सरकार आदिवासियों को अधिकार देने और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की बात करती है, तब इस प्रकार की कार्रवाइयाँ सरकारी दावों पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करती हैं। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि शासन और प्रशासन इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाते हैं और आदिवासी परिवारों को न्याय कैसे दिलाया जाता है।

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