आदिकैलाश और ओम पर्वत : आस्था और प्रकृति का अद्भुत सफर
यात्रा संस्मरण
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भारत सागर न्यूज/मोहन वर्मा/देवास। पर्यटन प्रेमी और घुमक्कड़, चाहे वे किसी भी उम्र के हों, हर जगह मिल जाते हैं। कोई प्रकृति की अनुपम सुंदरता देखने निकलता है तो कोई दुर्गम पहाड़ों में बसे आस्था के केंद्रों की ओर खिंचा चला जाता है। हिमाचल, सिक्किम, अमरनाथ, बद्रीनाथ, केदारनाथ, चारधाम, गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान और अंडमान-निकोबार की यात्राओं के बाद इस बार हमारा कारवां निकला आदिकैलाश और ओम पर्वत की ओर।
देवास की 44 डिग्री तापमान वाली तपती गर्मी से निकलकर हम तीन मित्र पहुँचे हल्द्वानी। हल्द्वानी से कुछ दूरी पर स्थित काठगोदाम रेलवे स्टेशन उत्तराखंड का अंतिम रेलवे स्टेशन माना जाता है। यहीं से पहाड़ों का वास्तविक सफर शुरू होता है। घुमावदार सड़कें, बादलों से घिरी पहाड़ियाँ और घाटियों में बहती नदियाँ मन को रोमांच से भर देती हैं।
सड़क मार्ग से आगे बढ़ते हुए हम पहुँचे पिथौरागढ,जो इस यात्रा का एक महत्वपूर्ण बेस कैंप है। वहाँ से हमारा कारवाँ पहुँचा धारचूला, जो भारत-नेपाल सीमा पर बसा एक सुंदर कस्बा है। इसके साथ-साथ बहती काली नदी का हरा, निर्मल जल और कल-कल करता प्रवाह मन को मोह लेता है। नदी के एक ओर भारत और दूसरी ओर नेपाल की बस्तियाँ दिखाई देती हैं। यही रास्ता आगे कैलाश मानसरोवर, आदिकैलाश और ओम पर्वत तक जाता है।
रास्ते में सबसे पहले हमने दर्शन किए नीम करौली बाबा के आश्रम के। देशभर से श्रद्धालु यहाँ बाबा का आशीर्वाद लेने पहुँचते हैं। पहाड़ों की शांत वादियों में स्थित यह धाम मन को अद्भुत सुकून देता है। इसके बाद हम पहुँचे चितई गोलू देवता मंदिर, जहाँ विराजते हैं पहाड़ों के न्याय के देवता गोलू देव। यहाँ लोग अपनी पीड़ा और अन्याय की अर्जियाँ मंदिर में बाँधते हैं और मनोकामना पूर्ण होने पर घंटियाँ चढ़ाकर आभार व्यक्त करते हैं। मंदिर में टंगी हजारों घंटियाँ और अर्जियाँ इस अटूट विश्वास की गवाही देती हैं कि देवता सबकी सुनते हैं। हमारे सफर का अगला पड़ाव था जागेश्वर धाम। देवदार के घने जंगलों के बीच स्थित यह प्राचीन मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से भरा हुआ है। कहा जाता है कि आदिकैलाश और कैलाश मानसरोवर यात्रा का आध्यात्मिक आरंभ यहीं से होता है। सैकड़ों वर्ष पुराने इस परिसर में सवा सौ से अधिक शिवलिंग स्थापित हैं, जहाँ पहुँचकर मन स्वतः ही शांत हो जाता है।
शाम ढलते-ढलते हमारा कारवां पहुँचा गुंजी गांव। दुर्गम पहाड़ी रास्तों से गुजरते हुए हम अपने होम-स्टे पहुँचे। अगली सुबह जब हम लगभग पंद्रह हजार फीट की ऊँचाई पर स्थित आदिकैलाश पहुँचे, तो सामने फैली हिमाच्छादित पर्वत श्रृंखलाओं ने मानो मन को मंत्रमुग्ध कर दिया। ऐसा प्रतीत होता था मानो स्वयं भगवान शिव हिमालय की गोद में विराजमान हों। ढाई किलोमीटर की परिक्रमा के दौरान पार्वती कुंड, भीम खेत और गौरीकुंड के दर्शन हुए। बर्फीली हवाओं और शांत वातावरण के बीच यह अनुभव शब्दों से परे था।
अगली सुबह हम निकले ओम पर्वत की ओर। दुर्गम रास्तों और ऊँचे पहाड़ों के बीच जब दूर बर्फ से ढकी चोटी पर प्राकृतिक रूप से बनी “ॐ” की आकृति दिखाई दी, तो मन श्रद्धा से भर उठा। उस क्षण केवल “ॐ नमः शिवाय” का जाप ही हृदय में गूंज रहा था।
ओम पर्वत के दर्शन के बाद हमारी वापसी यात्रा शुरू हुई। हम फिर पहाड़ों की ठंडक छोड़कर मालवा की धरती और 43-44 डिग्री तापमान में लौट आए । सहयात्री भाई श्रीकांत पटवा और राहुल परमार के साथ आदिकैलाश और ओम पर्वत की यह रोमांचक, आध्यात्मिक और अविस्मरणीय यात्रा हमेशा के लिए हमारे मन और स्मृतियों में बस गई।



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