नगर निगम द्वारा रामघाट पर शिप्रा आरती की सामग्री जब्त करने का विरोध करते हुए, पांडा समिति ने प्रशासन से कार्रवाई रोकने की मांग की है।
भारत सागर न्यूज/उज्जैन /संजय शर्मा। रामघाट पर प्रतिदिन होने वाली मां शिप्रा आरती से जुड़े पंडित-पुजारियों की आरती सामग्री नगर निगम एवं पुलिस द्वारा जब्त किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। इस कार्रवाई के विरोध में क्षेत्र पांडा समिति के पदाधिकारी एवं पंडित-पुजारी रामघाट पर एकत्रित हुए और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराया।
समिति ने आरोप लगाया कि प्रशासन द्वारा नोटिस देकर आरती में उपयोग होने वाली सामग्री जब्त की जा रही है, जिससे वर्षों से चली आ रही शिप्रा आरती प्रभावित हो रही है। समिति का कहना है कि इस प्रकार की कार्रवाई से ऐसा प्रतीत होता है कि आरती को बंद कराने का प्रयास किया जा रहा है। महाकाल शिप्रा आरती के संस्थापक पंडित आनंद जोशी 'लोटा वाला' ने बताया कि रामघाट पर कई वर्षों से नियमित रूप से शाम की शिप्रा आरती की जाती है, जिसमें देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होकर मां शिप्रा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
रामघाट के पंडित-पुजारी हमेशा शासन-प्रशासन का सहयोग करते आए हैं और आगे भी करते रहेंगे। शासन की कोई नई व्यवस्था या योजना है तो उसकी जानकारी पंडित-पुजारियों को दी जाए। सभी नियमों का पालन करते हुए पूरा सहयोग किया जाएगा, लेकिन बिना स्पष्ट जानकारी दिए आरती की सामग्री जब्त करना उचित नहीं है। जब्त की गई सामग्री केवल आरती में उपयोग होने वाली सामग्री है, न कि अतिक्रमण या किसी अन्य उद्देश्य की। पंडित आनंद जोशी ने यह भी बताया कि आरती से पहले लाउडस्पीकर के माध्यम से श्रद्धालुओं से अपील की जाती है कि वे शिप्रा नदी में फूल-पत्ती या अन्य सामग्री न डालें, ताकि नदी स्वच्छ बनी रहे।
इसी जागरूकता अभियान में उपयोग होने वाला माइक भी नगर निगम द्वारा जब्त कर लिया गया, जबकि उसका उद्देश्य केवल श्रद्धालुओं को स्वच्छता के प्रति जागरूक करना था। समिति का कहना है कि बरसात के दौरान भी पंडित-पुजारी प्रशासन के निर्देशों का पालन करते हुए समय से पहले अपनी सामग्री हटा लेते हैं और निर्धारित नियमों के अनुसार ही शाम की आरती संपन्न कराते हैं। क्षेत्र पांडा समिति ने शासन-प्रशासन से मांग की है कि आरती सामग्री जब्त करने की कार्रवाई तत्काल बंद की जाए तथा वर्षों से चली आ रही शांतिपूर्ण शिप्रा आरती को पूर्ववत संचालित होने दिया जाए। साथ ही प्रशासन और पंडित-पुजारियों के बीच संवाद स्थापित कर ऐसा समाधान निकाला जाए जिससे धार्मिक परंपरा और प्रशासनिक व्यवस्था, दोनों का सम्मान बना रहे।




Comments
Post a Comment