प्राचीन भारतीय ज्ञान ही आधुनिक विज्ञान का आधार हैं
भारत सागर न्यूज/देवास। प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस कृष्णाजीराव पवार शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय देवास में भारतीय ज्ञान परम्परा प्रकोष्ठ के त्रैमासिक केलेण्डर के अनुपालन में एवं आईक्यूएसी के तत्वावधान में माह अगस्त में राष्ट्रीय रसायन विज्ञान दिवस एवं भारतीय अक्षय र्जा दिवस के उपलक्ष्य में 19 एवं 20 अगस्त 2026 को दो दिवसीय कार्यक्रम में विभिन्न गतिविधियॉ प्राचार्य डॉ. आर.एस.अनारे की अध्यक्षता एवं मार्गदर्शन में सम्पन्न की गई। कार्यक्रम का शुभारम्भ मंचासीन अतिथियों के द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं छात्रा बीनू पटेल एवं पायल चौहान द्वारा सरस्वती वंदना के साथ हुआ। वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ.राजेन्द्र मराठा, डॉ. सीमा सोनी एवं आईक्यूएसी प्रभारी डॉ. संजय गाडगे मंचासीन रहे। कार्यक्रम की संयोजक डॉ. अराधना डिकूना ने 02 दिवसीय कार्यक्रम की रूपरेखा प्रस्तुत की एवं भारतीय ज्ञान परम्परा की सहसंयोजक डॉ. रश्मि ठाकुर ने स्वागत भाषण देते हुए प्रकोष्ठ की आगामी कार्ययोजना की जानकारी साझा की।
कार्यक्रम के प्रथम दिवस में विज्ञान विभाग में विद्यार्थियों द्वारा विषय आधारित विज्ञान मॉडल एवं प्रोजेक्ट आधारित प्रदर्शनी लगाई गई। गतिविधियों की श्रंृखला में ’’ भारतीय ज्ञान परम्परा एवं अक्षय उर्जा ’’ तथा ’’ आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय का भारतीय विज्ञान एवं उद्योग में योगदान’’ विषयों पर आधारित निबंध प्रतियोगिता में विद्यार्थियों ने सहभागिता की जिसमें क्रमशः प्रथम स्थान करीना शेख एवं लक्ष्मी मांझी , द्वितीय स्थान शुभम गोयल तथा रूपेश पाटीदार, तृतीय स्थान भावना सैंधव और मोहम्मद हुनैफ ने प्राप्त किया।
कार्यक्रम के द्वितीय दिवस में आयोजित व्याख्यानमाला में मुख्य वक्ता के रूप में आंमत्रित महाविद्यालय के विद्वत प्राध्यापक डॉ. संजय बरोनिया, डॉ. संदीप नागर ने उदबोधन दिए। डॉ. संदीप नागर ने आचार्य प्रफुल्लचंद्र राय की जन्म जयंती (02 अगस्त) पर उन्हें स्मरण करते हुए आचार्य राय के कथन ’’ विज्ञान को सीखिए , विज्ञान को खोजिए और विज्ञान को समाज के कल्याण में लगाइए ’’ को वर्तमान में आधुनिक भारत की आत्मनिर्भरता, नवाचार , स्टार्टअप, स्वदेशी तकनीक तथा शोध आधारित उद्योगों के लिए प्रांसगिक बताया। डॉ. संजय बरोनिया ने ’’ अक्षय ऊर्जा- वेदिक ज्ञान से वैश्विक क्रांति तक’’ विषय पर अपने वक्तव्य में कहा कि भारत को स्वच्छ ऊर्जा में वैश्विक अग्रदूत बनाने के लिए विभिन्न प्रकार के स्वदेशीय नवाचारों एवं प्राचीन ऋषि दृष्टि को अपनाने की आवश्यकता हैं। साथ ही अक्षय ऊर्जा के अनेक नवीकरणीय स्रोतों तथा ऊर्जा संरक्षण हेतु शासन द्वारा जारी योजनाओं की विस्तृत जानकारी पीपीटी के माध्यम से दी।
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ रतन सिंह अनारे ने अपने अध्यक्षीय में कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध बनाने हेतु हमें संस्कृत साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। संस्कृत साहित्य भारतीय ज्ञान परंपरा का एक अद्भुत भंडार है। सभागार में उपस्थित समस्त प्राध्यापक गण, गैर शैक्षणिक स्टॉफ तथा द्वारा ऊर्जा संरक्षण का संकल्प लिया गया। डॉ. लीना दुबे ने मंच संचालन करते हुए कहा कि वर्तमान ऊर्जा संकट एवं जलवायु परिर्वतन के दौर में सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए वैज्ञानिक समाधान ही एक मात्र उपाय हैं। जिसे प्राचीन भारतीय ऋषि वैज्ञानिकों की ऋचाओं में निहित ज्ञान ’ प्रकृति संरक्षण एवं संतुलन’ के माध्यम से ही प्राप्त किया जा सकता हैं। अंत में आभार परम्परा का निर्वहन डॉ. अदिति कुमावत ने किया।




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